हर गाँव की मिट्टी में सिर्फ फसलें ही नहीं उगतीं, कुछ कहानियाँ भी उगती हैं — ऐसी कहानियाँ जो किताबों में नहीं मिलतीं, पर लोगों की आँखों में दिख जाती हैं। खजुरिया भी उन्हीं गाँवों में से एक है। यहाँ सुबहें सामान्य लगती हैं, दोपहरें संघर्ष में गुजरती हैं और रातें… रातें हमेशा कुछ छुपाकर रखती हैं।यह कहानी किसी एक व्यक्ति की नहीं, कई पीढ़ियों की साँसों से बनी है। इसमें प्रेम है तो पीड़ा भी है, साहस है तो डर भी है, विश्वास है तो पाखंड भी है। यहाँ मंदिर की घंटियों के बीच बेरोजगार युवाओं की खामोशी है, महिलाओं के श्रृंगार के पीछे छिपी मजबूरियाँ हैं, पुरुषों का अनकहा दर्द है, और उन बुज़ुर्ग आँखों की थकान है जिन्होंने बहुत कुछ देखा पर कम कहा।
जो आप पढ़ने जा रहे हैं वह सिर्फ मनोरंजन नहीं, एक दर्पण है — समाज का, मन का और समय का। हर घटना आपको वास्तविक लगेगी, हर पात्र कहीं न कहीं अपने जैसा महसूस होगा, और हर मोड़ पर आपको लगेगा कि यह सिर्फ कहानी नहीं… शायद सच भी हो सकता है।
इस यात्रा में रहस्य होगा, सनसनी होगी, न्याय की तलाश होगी, आध्यात्मिक प्रश्न होंगे और इंसानियत की छोटी-छोटी जीतें भी होंगी। कभी आप मुस्कुराएँगे, कभी सिहर उठेंगे, कभी सोच में पड़ जाएँगे और कभी अपने ही जीवन से तुलना करने लगेंगे।
तो जब आप पहला एपिसोड पढ़ें, उसे केवल शब्दों की तरह मत पढ़िए… उसे दृश्य की तरह देखिए, आवाज़ों की तरह सुनिए और भावनाओं की तरह महसूस कीजिए। क्योंकि खजुरिया की यह कहानी शुरू होते ही आपको अपने साथ ले चलेगी — वहाँ जहाँ अंधेरा सिर्फ डर नहीं, एक रहस्य है… और हर रहस्य के पीछे छुपा है एक राजकुमार, जो दिखता नहीं पर हर जगह मौजूद है।
अंधेरे का राजकुमार – वह रात जब खजुरिया ने साँस रोक ली
15 जून 2025 की शाम मध्यप्रदेश के छोटे से गाँव खजुरिया पर कुछ ऐसा उतर रहा था जिसे कोई देख नहीं पा रहा था, पर हर कोई महसूस कर रहा था। सूरज ढल चुका था, लेकिन आसमान में लालिमा कुछ ज्यादा देर तक टिकी रही, जैसे दिन जाने को तैयार ही न हो। खेतों के ऊपर उड़ते बगुले अचानक दिशा बदलकर तालाब की ओर लौट गए थे, और कच्ची सड़क पर चलने वाली आख़िरी बस बिना हॉर्न दिए ही निकल गई। गाँव के बुज़ुर्गों ने इसे सामान्य नहीं माना, पर जवान लड़कों ने हँसकर टाल दिया। उन्हें क्या पता था कि आने वाली रात सिर्फ अंधेरा नहीं, एक कहानी लेकर आ रही है — ऐसी कहानी जो कई पीढ़ियों की परतों को खोलने वाली थी।
खजुरिया का नाम सरकारी कागज़ों में भले छोटा हो, पर उसके भीतर अनगिनत किस्से दबे थे। यहाँ की मिट्टी में गेहूँ के साथ यादें भी उगती थीं। गाँव के बीचों-बीच एक पुरानी हवेली थी, जिसके बारे में कहा जाता था कि उसके मालिक की तीसरी पीढ़ी अचानक लापता हो गई थी। किसी ने सच कभी जानने की कोशिश नहीं की, क्योंकि रोज़ की रोटी, बेरोजगारी, कर्ज़ और परिवार की जिम्मेदारियाँ ही लोगों को इतना थका देती थीं कि रहस्य जानने का समय ही नहीं बचता था। यही खजुरिया की सच्चाई थी — सपने बड़े, जेब खाली, और उम्मीदें आधी।
उसी शाम शहर से लौटा था विक्रम। उम्र लगभग तीस, आँखों में थकान, पर भीतर कहीं जिद भी। वह उन हजारों युवाओं में से एक था जो नौकरी की तलाश में शहर गए और खाली हाथ लौटे। लेकिन उसके लौटने में सिर्फ बेरोजगारी की मजबूरी नहीं थी, एक अनकहा खिंचाव भी था, जैसे कोई अदृश्य धागा उसे वापस खींच लाया हो। जब वह बस स्टैंड से उतरा तो गाँव के दो लड़कों ने उसे पहचान लिया, पर नमस्ते करने से पहले ही उनके चेहरों पर एक अजीब सा डर तैर गया। विक्रम ने सोचा शायद सालों बाद लौटने की झिझक है, पर बात कुछ और थी।
गाँव के बाहर पीपल के पेड़ के पास उसे एक बूढ़ी औरत मिली जो अक्सर बच्चों को कहानियाँ सुनाया करती थी। आज वह चुप थी। उसने विक्रम को देखा और बस इतना कहा, “आज रात जल्दी घर पहुँच जाना… हवा ठीक नहीं है।” यह सुनकर विक्रम के भीतर हल्की सिहरन हुई, पर उसने मुस्कुरा कर सिर हिला दिया। डर उसे शहर में भी मिला था, पर वहाँ डर किराए के कमरे का था, यहाँ डर हवा में था
घर पहुँचा तो माँ की आँखों में खुशी और चिंता दोनों थीं। पिता चुप बैठे रहे, जैसे कुछ कहना चाहते हों पर शब्दों पर ताला लगा हो। खाने की थाली सामने रखी गई, पर रोटी की खुशबू में भी बेचैनी थी। बातचीत में पता चला कि पिछले कुछ हफ्तों से गाँव में अजीब घटनाएँ हो रही थीं। रात में किसी के कदमों की आहट, खाली खेतों में फुसफुसाहट, और कभी-कभी दूर से आती चीख जैसी आवाज़। कुछ लोग इसे अंधविश्वास कह रहे थे, कुछ पाखंड, और कुछ ने इसे किसी पुराने अपराध की परछाईं बताया। सच क्या था, कोई तय नहीं कर पा रहा था।
इसी गाँव में रहती थी आर्या — स्कूल की शिक्षिका। वह उन कम लोगों में थी जो डर से ज्यादा सवालों पर भरोसा करती थी। उस रात जब वह घर लौट रही थी, उसने देखा कि मंदिर की घंटी बिना हवा के अपने आप हिल रही है। उसने पास जाकर देखा, पर कुछ नहीं मिला। उसकी आँखों में डर कम, जिज्ञासा ज्यादा थी। उसने मन ही मन तय किया कि इस रहस्य का जवाब ढूँढेगी, चाहे जो हो।
गाँव की दूसरी परत और भी गहरी थी। बेरोजगारी ने कई युवाओं को गलत रास्तों की ओर धकेल दिया था। कुछ लोग छोटे-मोटे अपराधों में उलझ गए थे, कुछ ने शहर की चकाचौंध में अपनी पहचान खो दी थी। वहीं दूसरी ओर कुछ परिवार ऐसे भी थे जहाँ बेटियाँ घर सँभाल रही थीं और बेटे शहरों में भटक रहे थे। पुरुषों का दर्द कोई खुलकर नहीं कहता, महिलाओं की पीड़ा समाज की आदत बन चुकी थी। फिर भी त्यौहारों पर श्रृंगार होता, मंदिर में दीपक जलते, और लोग उम्मीद की लौ बुझने नहीं देते। यही खजुरिया का संतुलन था — दुख और विश्वास साथ-साथ।
रात गहराई तो हवा का तापमान अचानक गिर गया। कुत्ते बिना कारण भौंकने लगे। दूर हवेली की तीसरी खिड़की में हल्की रोशनी दिखी, जबकि वर्षों से वहाँ कोई नहीं रहता था। विक्रम छत पर खड़ा यह सब देख रहा था। उसके भीतर साहस और जिज्ञासा दोनों थे, पर धैर्य भी था। उसने तुरंत भागने के बजाय ध्यान से देखने का फैसला किया। उसे अपने दादा की बातें याद आईं — “सत्य हमेशा शोर नहीं करता, वह इंतज़ार करता है कि कौन उसे सुनने की हिम्मत रखता है।”
उसी समय गाँव के एक युवक की अचानक चीख सुनाई दी। लोग घरों से बाहर निकले, पर अँधेरे ने सबको आधा अंधा कर दिया था। किसी ने कहा उसने परछाईं देखी, किसी ने कहा यह सब मन का भ्रम है, और किसी ने मौका देखकर अफवाह फैलानी शुरू कर दी। पाखंड और डर का मेल गाँव को बाँटने लगा। कुछ लोग मंदिर की ओर भागे, कुछ हवेली की ओर, और कुछ ने दरवाज़े बंद कर लिए। यह वही क्षण था जहाँ साहस, अंधविश्वास और अवसरवाद एक ही जगह खड़े थे।
आर्या ने बच्चों को घरों के अंदर रहने की सलाह दी। विक्रम ने दो-तीन युवकों को शांत रहने को कहा। एक बूढ़ा आदमी बार-बार कह रहा था कि यह सब पुरानी पीढ़ी के पापों का फल है। हवा में करुणा भी थी, क्रोध भी, हास्य की हल्की झलक भी जब कोई डर के बीच मज़ाक कर देता, और भयानकता भी जब हवेली की खिड़की की रोशनी फिर टिमटिमाती। यह रात जैसे सभी रसों का संगम बन गई थी।
धीरे-धीरे सब शांत हुआ, पर शांति वैसी नहीं थी जैसी सामान्य दिनों में होती है। यह तूफान के पहले की शांति जैसी थी। विक्रम ने तय किया कि वह अगले दिन से गाँव की पुरानी कहानियाँ, हवेली का इतिहास और हाल की घटनाओं की कड़ियाँ जोड़ेगा। आर्या ने भी मन बना लिया कि वह बच्चों और युवाओं को डर से ऊपर उठने की सीख देगी। दोनों की सोच अलग रास्तों से चलकर एक ही दिशा में मिल रही थी — सत्य की खोज।
रात के अंतिम पहर जब सब सोने की कोशिश कर रहे थे, तब हवेली की तीसरी खिड़की की रोशनी अचानक बुझ गई। उसी क्षण मंदिर की घंटी एक बार जोर से बजी और फिर सन्नाटा। ऐसा लगा जैसे किसी ने अदृश्य परदा गिरा दिया हो। खजुरिया ने उस रात नींद नहीं ली, उसने बस इंतज़ार किया — आने वाले खुलासों का, नई सुबह का, और उस अंधेरे के राजकुमार का, जो शायद कोई व्यक्ति नहीं बल्कि एक सच था, जो वर्षों से छिपा बैठा था।
और जब पहली किरण खेतों पर पड़ी, तब भी लोगों के दिलों में रात की छाया बची हुई थी। किसी ने कुछ खोया नहीं था, पर कुछ बदल जरूर गया था। विश्वास और डर के बीच एक नई लड़ाई शुरू हो चुकी थी। यह सिर्फ एक रात नहीं थी, यह उस कहानी का पहला पन्ना था जो आने वाले दिनों में कई पीढ़ियों की परतें खोलने वाली थी — प्रेम, साहस, त्याग, न्याय और करुणा के साथ-साथ अपराध, पाखंड और अवसरवाद की भी।
अंत में तीन सवाल हवा में तैरते रह गए —
- क्या हवेली की तीसरी खिड़की में सचमुच कोई था या वह किसी पुराने अपराध का संकेत था?
- विक्रम की वापसी महज़ संयोग थी या किसी छिपी कड़ी की शुरुआत?
- और क्या खजुरिया का डर अंधविश्वास था… या किसी ऐसे सत्य की आहट जिसे गाँव जानना नहीं चाहता?

अंधेरे का राजकुमार – वह रात जब खजुरिया ने साँस रोक ली

